| श्री विष्णु पुराण » अंश 1: प्रथम अंश » अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन » श्लोक 61 |
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| | | | श्लोक 1.5.61  | हिंस्रा हिं स्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।
तद्भाविता: प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते॥ ६१ ॥ | | | | | | अनुवाद | | उस समय हिंसा-अहिंसा, मृदुता-कठोरता, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य - ये सब उन्हें पूर्वभावानुसार प्राप्त होते हैं और इसी कारण वे इन्हें प्रिय लगने लगते हैं ॥ 61॥ | | | | At that time, violence-nonviolence, mildness-harshness, dharma-adharma, truth-falsehood - all these are attained by them according to their previous feelings and because of this they start liking these. ॥ 61॥ | | ✨ ai-generated | | |
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