श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  1.5.56 
एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।
अनुष्टुभं च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
तथा उत्तर-मुख से उन्होंने एकविंशतिस्तोम, अथर्ववेद, आप्टोर्यमान, अनुष्टुपण्ड तथा वैराज की रचना की। 56॥
 
And from Uttar-Mukh he created Ekavinshatistom, Atharvaveda, Aptoryaman, Anushtupand and Vairaj. 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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