श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.5.53 
गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम्।
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तब ब्रह्माजी ने अपने पहले (पूर्व) मुख से गायत्री, ऋक्, त्रिवृत्सोम रथन्तर और अग्निस्थोम यज्ञों की रचना की। 53॥
 
Then from his first (former) mouth Brahmaji created the Gayatri, Rik, Trivritsoma Rathantara and Agnisthoma yagyas. 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)