vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 1: प्रथम अंश
»
अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन
»
श्लोक 53
श्लोक
1.5.53
गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम्।
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ ५३॥
अनुवाद
तब ब्रह्माजी ने अपने पहले (पूर्व) मुख से गायत्री, ऋक्, त्रिवृत्सोम रथन्तर और अग्निस्थोम यज्ञों की रचना की। 53॥
Then from his first (former) mouth Brahmaji created the Gayatri, Rik, Trivritsoma Rathantara and Agnisthoma yagyas. 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×