श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  1.5.48-49 
अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोऽजा: स सृष्ट वान‍् ।
सृष्टवानुदरा द‍्ग ाश्च पार्श्वाभ्यां च प्रजापति:॥ ४८ ॥
प द्‍भ्यां चाश् वान‍् समातङ्गा न्‍रा सभान्गवया न‍् मृगान्।
उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूनन्याश्च जातय:॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर उन्होंने अपनी छाती से भेड़, मुख से बकरा, उदर और पार्श्वों से गाय, तथा पैरों से घोड़ा, हाथी, गधा, वनगाय, मृग, ऊँट, खच्चर और न्यांकु आदि पशुओं की रचना की ॥48-49॥
 
Subsequently, he created animals like sheep from his chest, goat from his mouth, cow from his abdomen and sides, horse, elephant, donkey, forest cow, deer, camel, mule and nyanku from his legs. 48-49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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