श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  1.5.44-45 
अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा केशा: शीर्यन्त वेधस:।
हीनाश्च शिरसो भूय: समारोहन्त तच्छिर:॥ ४४ ॥
सर्पणात्तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादहय: स्मृता:।
तत: क्रुद्धो जगत्स्रष्टा क्रोधात्मानो विनिर्ममे।
वर्णेन कपिशेनोग्रभूतास्ते पिशिताशना:॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
उनका यह दुष्ट आचरण देखकर ब्रह्माजी के बाल उनके सिर से गिरकर पुनः उनके सिर पर प्रकट हो गए। इस प्रकार ऊपर चढ़ने के कारण वे 'सर्प' कहलाए और नीचे गिरने के कारण 'अहि' कहलाए। तदनन्तर जगत् के रचयिता ब्रह्माजी ने क्रोधित होकर क्रोधी प्राणियों की रचना की; वे पीले रंग के, अत्यन्त उग्र स्वभाव वाले और मांसाहारी थे। 44-45॥
 
Seeing this evil behavior of his, Brahmaji's hair fell from his head and then reappeared on his head. In this way, because of climbing up, they were called 'Serpent' and because of falling down, they were called 'Ahi'. Thereafter, the creator of the world, Brahmaji got angry and created angry creatures; They were of yellow complexion, of very aggressive nature and were non-vegetarians. 44-45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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