श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 5: अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.5.19 
इत्येते कथिता: सर्गा: षडत्र मुनिसत्तम।
प्रथमो महत: सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु स:॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
हे महामुनि! अब तक मैंने आपसे छः स्कन्ध कहे हैं। उनमें महत्तत्त्व को ब्रह्मा का प्रथम स्कन्ध जानना चाहिए। 19॥
 
Oh great sage! Thus far I have told you six cantos. Among them, Mahatattva should be known as the first canto of Brahma. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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