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श्लोक 1.5.19  |
इत्येते कथिता: सर्गा: षडत्र मुनिसत्तम।
प्रथमो महत: सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु स:॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे महामुनि! अब तक मैंने आपसे छः स्कन्ध कहे हैं। उनमें महत्तत्त्व को ब्रह्मा का प्रथम स्कन्ध जानना चाहिए। 19॥ |
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| Oh great sage! Thus far I have told you six cantos. Among them, Mahatattva should be known as the first canto of Brahma. 19॥ |
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