श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.22.87 
अहं हरि: सर्वमिदं जनार्दनो
नान्यत्तत: कारणकार्यजातम्।
ईदृङ्मनो यस्य न तस्य भूयो
भवोद्भवाद्वन्द्वगदाभवन्ति॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
मैं और यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन श्री हरि ही हैं; इनसे भिन्न कोई अन्य कारण या कार्य नहीं है’ - ऐसा भाव जिसके मन में होता है, उसे शरीर से उत्पन्न होने वाले राग-द्वेष आदि रोग नहीं होते ॥87॥
 
I and this entire world are Janardan Shri Hari only; There is no other cause or effect other than them' - the one who has such a feeling in his mind does not get the disease of attachment and hatred etc. arising from the body. 87॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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