श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.22.76 
अस्त्रभूषणसंस्थानस्वरूपं रूपवर्जित:।
बिभर्त्ति मायारूपोऽसौ श्रेयसे प्राणिनां हरि:॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
श्री हरि निराकार होते हुए भी मायावी रूप में जीवों के कल्याण के लिए इन सबको आयुध और आभूषण के रूप में धारण करते हैं ॥76॥
 
Shri Hari, despite being formless, wears all these in the form of weapons and ornaments for the welfare of living beings in an illusory form. 76॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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