श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  1.22.71 
चलत्स्वरूपमत्यन्तं जवेनान्तरितानिलम्।
चक्रस्वरूपं च मनो धत्ते विष्णुकरे स्थितम्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
वह अत्यंत चंचल, सात्विक अहंकारी मन, जो अपने वेग से वायु को भी परास्त कर देता है, भगवान श्रीविष्णु के चरणकमलों में स्थित चक्र का रूप धारण कर लेता है ॥71॥
 
The extremely fickle, sattvik egoistic mind, which defeats even the wind with its speed, takes the form of the chakra situated in the lotus feet of Lord Shri Vishnu. 71॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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