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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 22: विष्णु भगवान्की विभूति और जगत्की व्यवस्थाका वर्णन
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श्लोक 70
श्लोक
1.22.70
भूतादिमिन्द्रियादिं च द्विधाहङ्कारमीश्वर:।
बिभर्त्ति शङ्खरूपेण शार्ङ्गरूपेण च स्थितम्॥ ७०॥
अनुवाद
भूतों के कारण उत्पन्न तामस अहंकार और इन्द्रियों के कारण उत्पन्न राजसिक अहंकार, उन दोनों को वह शंख और धनुष के रूप में धारण करता है ॥70॥
Tamasic ego due to ghosts and Rajasic ego due to senses, both of them he wears in the form of a conch and a bow. 70॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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