श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.22.68 
आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्।
बिभर्त्ति कौस्तुभमणिस्वरूपं भगवान‍्हरि:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
श्री हरि इस जगत् के शुद्ध एवं पवित्र आत्मा को अर्थात् क्षेत्रज्ञ के शुद्ध स्वरूप को कौस्तुभमणि के रूप में धारण करते हैं ॥68॥
 
Shri Hari embodies the pure and pure soul of this world i.e. the pure form of the expert in the field in the form of Kaustubhamani. 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)