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श्लोक 1.22.68  |
आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्।
बिभर्त्ति कौस्तुभमणिस्वरूपं भगवान्हरि:॥ ६८॥ |
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| अनुवाद |
| श्री हरि इस जगत् के शुद्ध एवं पवित्र आत्मा को अर्थात् क्षेत्रज्ञ के शुद्ध स्वरूप को कौस्तुभमणि के रूप में धारण करते हैं ॥68॥ |
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| Shri Hari embodies the pure and pure soul of this world i.e. the pure form of the expert in the field in the form of Kaustubhamani. 68॥ |
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