श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.22.52 
तत्र ज्ञाननिरोधेन योगिनो यान्ति ये लयम्।
संसारकर्षणोप्तौ ते यान्ति निर्बीजतां द्विज॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! जो योगीजन अन्य विद्याओं को छोड़कर इसी (चौथे रहस्य) में लीन हो जाते हैं, वे इस संसार-क्षेत्र में बीज बोने का कार्य करते हुए बीजरहित (वासनारहित) होते हैं। [अर्थात् यदि वे लोक-कल्याण के लिए भी कर्म करते रहें, तो भी उन्हें पाप या पुण्य रूप में उन कर्मों का कोई फल नहीं मिलता]॥52॥
 
Hey Dwija! Those yogis who stop other knowledge and become absorbed in this (the fourth secret) are seedless (lustless) in doing the work of sowing seeds within this worldly sphere. [That is, even if they keep doing work for the welfare of the people, they do not get any result of those deeds in the form of sin or virtue]॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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