श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 49-51
 
 
श्लोक  1.22.49-51 
ज्ञानत्रयस्य वै तस्य विशेषो यो महामुने।
तन्निराकरणद्वारा दर्शितात्मस्वरूपवत्॥ ४९॥
निर्व्यापारमनाख्येयं व्याप्तिमात्रमनूपमम्।
आत्मसम्बोधविषयं सत्तामात्रमलक्षणम्॥ ५०॥
प्रशान्तमभयं शुद्धं दुर्विभाव्यमसंश्रयम्।
विष्णोर्ज्ञानमयस्योक्तं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
और हे महात्मन्! उपर्युक्त तीनों प्रकार के ज्ञानों के लक्षणों का नाश करके भगवान् विष्णु द्वारा अनुभव किए हुए आत्मस्वरूप के समान जो ज्ञानस्वरूप है, जो निराकार, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, अद्वितीय, आत्मतत्त्वस्वरूप, एकमात्र स्वरूप, लक्षणरहित, शान्त, अभय, शुद्ध, भावों से परे और आश्रयरहित है, वह 'ब्रह्म' नामक ज्ञान है (उसका चौथा रहस्य)। 49-51॥
 
And O great one! After eliminating the characteristics of the above mentioned three types of knowledge, the form of knowledge similar to the form of the self experienced by Lord Vishnu, which is the formless, indescribable, omnipresent, unique, form of self-realization, the only form of being, symptomless, calm, fearless, pure, beyond emotions and without shelter, is the knowledge called 'Brahm' [its fourth secret]. 49-51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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