श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 22: विष्णु भगवान‍्की विभूति और जगत‍्की व्यवस्थाका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.22.43 
श्रीमैत्रेय उवाच
चतुष्प्रकारतां तस्य ब्रह्मभूतस्य हे मुने।
ममाचक्ष्व यथान्यायं यदुक्तं परमं पदम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
श्री मैत्रेयजी बोले - हे ऋषिवर! आपने जो भगवान का परमपद चार प्रकार का बताया है, वह किस प्रकार है? कृपया इसे विधिपूर्वक मुझे बताइए।
 
Sri Maitreya said - O sage! How is the supreme state of God, which you have described, of four kinds? Please tell me this methodically.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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