vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 1: प्रथम अंश
»
अध्याय 22: विष्णु भगवान्की विभूति और जगत्की व्यवस्थाका वर्णन
»
श्लोक 42
श्लोक
1.22.42
तच्च ज्ञानमयं व्यापि स्वसंवेद्यमनौपमम्।
चतुष्प्रकारं तदपि स्वरूपं परमात्मन:॥ ४२॥
अनुवाद
वह परमात्मा का स्वरूप ज्ञानमय, सर्वव्यापक, स्वयंप्रकाशमान और अद्वितीय है तथा चार प्रकार का ही है ॥ 42॥
That form of the Supreme Being is knowledgeable, all-pervasive, self-perceptible (self-illuminating) and unique and it is of four types only. ॥ 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×