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श्लोक 1.22.38  |
यत्किञ्चित्सृज्यते येन सत्त्वजातेन वै द्विज।
तस्य सृज्यस्य सम्भूतौ तत्सर्वं वै हरेस्तनु:॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| हे द्विज! जो भी प्राणी जो कुछ भी उत्पन्न करता है, उस प्राणी की सृष्टि का कारण श्री हरि का शरीर ही है ॥38॥ |
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| O twice born! Whatever is created by any living being, the body of Shri Hari is the cause behind the creation of that being. ॥ 38॥ |
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