श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 21: कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद‍्गणकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  1.21.39-40 
मा रोदीरिति तं शक्र: पुन: पुनरभाषत।
सोऽभवत्सप्तधा गर्भस्तमिन्द्र: कुपित: पुन:॥ ३९॥
एकैकं सप्तधा चक्रे वज्रेणारिविदारिणा।
मरुतो नाम देवास्ते बभूवुरतिवेगिन:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने उसे बार-बार मना किया कि रोना बंद करो। परन्तु जब वह गर्भ सात भागों में विभक्त हो गया, [तब भी नहीं मरा], तब इन्द्र ने अत्यन्त क्रोधित होकर अपने शत्रुनाशक वज्र से उन सातों भागों को सात-सात टुकड़ों में तोड़ डाला। वे स्वयं मरुत नामक अत्यंत तेजवान देवता बन गए। 39-40॥
 
Indra repeatedly told her not to cry. But when that womb got divided into seven parts, [and still did not die], Indra became very angry and broke each of them into seven pieces with his enemy-destroying thunderbolt. He himself became the very fast god named Marut. 39-40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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