श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 21: कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद‍्गणकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  1.21.30-31 
दितिर्विनष्टपुत्रा वै तोषयामास काश्यपम्।
तया चाराधित: सम्यक् काश्यपस्तपतां वर:॥ ३०॥
वरेणच्छन्दयामास सा च वव्रे ततो वरम्।
पुत्रमिन्द्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
पुत्रों के नष्ट हो जाने पर दितिनी ने कश्यपजी को प्रसन्न किया। उनकी विधिपूर्वक पूजा से संतुष्ट होकर तपस्वियों में श्रेष्ठ कश्यपजी ने उन्हें वर देकर प्रसन्न किया। उस समय उन्होंने इन्द्र को मारने में समर्थ एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का वर माँगा । 30-31॥
 
Ditini pleased Kashyapji after the loss of his sons. Satisfied with his proper worship, Kashyapaji, the best among ascetics, pleased him by giving him a boon. At that time he asked for the boon of a very bright son capable of killing Indra. 30-31॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas