श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.19.85 
सर्वगत्वादनन्तस्य स एवाहमवस्थित:।
मत्त: सर्वमहं सर्वं मयि सर्वं सनातने॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
भगवान् अनंत और सर्वव्यापी हैं; इसलिए वे मेरे ही रूप में विद्यमान हैं, इसलिए यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे उत्पन्न हुआ है, मैं ही यह सब हूँ और यह सब मुझ सनातन में ही विद्यमान है ॥ 85॥
 
The Lord is infinite and omnipresent; hence He exists in my form, therefore this entire universe has come from me, I am all this and all this exists in me, the eternal one. ॥ 85॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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