श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 67-69
 
 
श्लोक  1.19.67-69 
देवा यक्षासुरा: सिद्धा नागा गन्धर्वकिन्नरा:।
पिशाचा राक्षसाश्चैव मनुष्या: पशवस्तथा॥ ६७॥
पक्षिण: स्थावराश्चैव पिपीलिकसरीसृपा:।
भूम्यापोऽग्निर्नभो वायु: शब्द: स्पर्शस्तथा रस:॥ ६८॥
रूपं गन्धो मनो बुद्धिरात्मा कालस्तथा गुणा:।
एतेषां परमार्थश्च सर्वमेतत्त्वमच्युत॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
हे अच्युत! देवता, यक्ष, असुर, सिद्ध, नाग, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, राक्षस, मनुष्य, पशु, पक्षी, जीव-जन्तु, पिपीलिकाएँ (चींटियाँ), सरीसृप, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन, बुद्धि, आत्मा, काल और गुण - इन सबके परम स्वरूप आप ही हैं, वास्तव में ये सब आप ही हैं॥67-69॥
 
O Achyuta! Gods, Yakshas, ​​Asuras, Siddhas, Nagas, Gandharvas, Kinnars, Vampires, Rakshasas, humans, animals, birds, creatures, pipilikas (ants), reptiles, earth, water, fire, sky, air, words, touch, form, taste, smell, mind, intellect, soul, time and qualities - you are the ultimate form of all these, in reality you are all these. 67-69॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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