श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.19.63 
स चित्त: पर्वतैरन्त: समुद्रस्य महामति:।
तुष्टावाह्निकवेलायामेकाग्रमतिरच्युतम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
वह महान माता समुद्र में पर्वतों से लदी हुई होकर भी अपने दैनिक कर्मों का पालन करती हुई एकाग्र मन से श्री अच्युत भगवान् की इस प्रकार स्तुति करती थी ॥63॥
 
That great mother, after being loaded by the mountains in the sea, while performing her daily duties, with a concentrated mind, praised Shri Achyuta Bhagavan in this way. 63॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas