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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्का सुदर्शनचक्रको भेजना
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श्लोक 58
श्लोक
1.19.58
हिरण्यकशिपुरुवाच
दैतेया: सकलै: शैलैरत्रैव वरुणालये।
निश्छिद्रै: सर्वश: सर्वैश्चीयतामेष दुर्मति:॥ ५८॥
अनुवाद
हिरण्यकशिपु ने कहा- हे दैत्यों! तुम इस पर्वत को इस समुद्र के भीतर किसी ओर से खुला न रखो और इसे सब ओर से पर्वतों से दबा दो॥58॥
Hiranyakshipu said- Hey demons! You do not keep this mountain open from any side within this ocean and suppress it with mountains from all sides. 58॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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