श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.19.52 
हिरण्यकशिपुरुवाच
हे विप्रचित्ते हे राहो हे बलैष महार्णवे।
नागपाशैर्दृढैर्बद्‍ध्वा क्षिप्यतां मा विलम्ब्यताम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
हिरण्यकशिपु ने कहा, "हे विप्रचित्ते! हे पथो! हे बल! तुम दोनों इसे सर्प के पाश से अच्छी तरह बाँधकर समुद्र में डाल दो; विलम्ब मत करो।"
 
Hiranyakshipu said, "O Viprachitte! O Patho! O Bal! You two tie him well with the serpent's noose and throw him into the ocean; do not delay."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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