श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.19.51 
उवाच च स कोपेन सामर्ष: प्रज्वलन्निव।
निष्पिष्य पाणिना पाणिं हन्तुकामो जगद्यथा॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
और क्रोध और क्षोभ से जलते हुए वह हाथ मलता हुआ ऐसा बोलने लगा मानो वह सम्पूर्ण जगत् को मार डालेगा ॥51॥
 
And burning with anger and resentment, he rubbed his hands and spoke as if he would kill the entire world. ॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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