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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्का सुदर्शनचक्रको भेजना
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श्लोक 48
श्लोक
1.19.48
एतद्विजानता सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
द्रष्टव्यमात्मवद्विष्णुर्यतोऽयं विश्वरूपधृक्॥ ४८॥
अनुवाद
जो मनुष्य ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण चराचर जगत् को अपना ही स्वरूप देखना चाहिए, क्योंकि यह सब जगत्रूप भगवान विष्णु ही हैं ॥48॥
The person who knows this should see the entire living world as his own self, because all this is Lord Vishnu in the form of the world. 48॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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