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श्लोक 1.19.43  |
न चिन्तयति को राज्यं को धनं नाभिवाञ्छति।
तथापि भाव्यमेवैतदुभयं प्राप्यते नरै:॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| राज्य प्राप्ति की चिंता किसे नहीं होती और धन की इच्छा किसे नहीं होती? तथापि, दोनों ही उन्हें प्राप्त होते हैं, जो उन्हें प्राप्त करने के लिए ही बने हैं ॥ 43॥ |
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| Who is not worried about acquiring a kingdom and who does not desire wealth? However, both are obtained only by those who are meant to receive them. ॥ 43॥ |
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