श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान‍्का सुदर्शनचक्रको भेजना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.19.38 
त्वय्यस्ति भगवान‍् विष्णुर्मयि चान्यत्र चास्ति स:।
यतस्ततोऽयं मित्रं मे शत्रुश्चेति पृथक्‍कुत:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु आपमें, मुझमें तथा अन्य सभी स्थानों पर विद्यमान हैं। फिर 'यह मेरा मित्र है और यह मेरा शत्रु है' ऐसा भेद करने का स्थान कहाँ है? ॥38॥
 
Lord Vishnu is present in you, in me and everywhere else as well. Then where is the place for discrimination like 'this is my friend and this is my enemy'? ॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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