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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 19: प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्का सुदर्शनचक्रको भेजना
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श्लोक 37
श्लोक
1.19.37
सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये।
परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुत:॥ ३७॥
अनुवाद
हे पिता! सर्वव्यापी जगन्नाथ, सर्वव्यापी परमात्मा गोविन्द में शत्रु-मित्र का प्रश्न कहाँ है? 37॥
Oh father! Where is the question of enemy-friend in the omnipresent Jagannath, the universal Supreme Soul, Govind? 37॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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