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श्लोक 1.19.34  |
प्रह्लाद उवाच
ममोपदिष्टं सकलं गुरुणा नात्र संशय:।
गृहीतं तु मया किन्तु न सदेतन्मतं मम॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| प्रह्लादजी बोले - पिताजी ! इसमें कोई संदेह नहीं है, गुरुजी ने मुझे ये सब विषय सिखाये हैं, और मैंने इन्हें समझ भी लिया है; परन्तु मेरा विचार है कि वे सिद्धान्त अच्छे नहीं हैं। |
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| Prahladji said - Father! There is no doubt about this, Guruji has taught me all these subjects, and I have also understood them; but I think that those principles are not good. |
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