श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 18: प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.18.36 
यत्रानपायी भगवान‍् हृद्यास्ते हरिरीश्वर:।
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जिस हृदय में श्री हरि भगवान सदैव अक्षुण्ण रहते हैं, वहाँ वज्र भी लगकर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है, त्रिशूल की तो बात ही क्या है? 36॥
 
In the heart in which Shri Hari Bhagwan always resides intact, even a thunderbolt would break into pieces when it hits it, what can we say about a trident? 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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