श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 18: प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.18.27 
बहुनात्र किमुक्तेन स एव जगत: पति:।
स कर्ता च विकर्ता च संहर्ता च हृदि स्थित:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इस विषय में और क्या कहा जा सकता है? [मेरी राय में] वही सबके अन्तःकरण में स्थित होकर जगत् का स्वामी, उसका रचयिता, पालक और संहारकर्ता है ॥27॥
 
What more can be said on this subject? [In my opinion] He alone, present in everyone's conscience, is the Lord of the universe, its creator, preserver and destroyer. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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