श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 18: प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.18.26 
किं चापि बहुनोक्तेन भवन्तो गुरवो मम।
वदन्तु साधु वासाधु विवेकोऽस्माकमल्पक:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
और बहुत कहने से क्या लाभ? आप तो मेरे गुरु हैं; आप कुछ भी कह सकते हैं, चाहे ठीक हो या गलत। और मेरे विचार बहुत कम हैं॥ 26॥
 
And what is the use of saying too much? You are my Gurus; you can say anything, right or wrong. And I have very few thoughts.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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