श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 18: प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.18.25 
यतो धर्मार्थकामाख्यं मुक्तिश्चापि फलं द्विजा:।
तेनापि किं किमित्येवमनन्तेन किमुच्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणो! जो तुम्हें धन, धर्म, काम और मोक्षरूपी फल देते हैं, उनके विषय में तुम ऐसा क्यों कहते हो कि 'अनंत से तुम्हें क्या चाहिए?'॥ 25॥
 
O Brahmins! Why do you say this about those who give you the fruits of wealth, religion, desire and salvation, that 'what do you need from the infinite?'॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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