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श्लोक 1.18.17  |
पिता गुरुर्न सन्देह: पूजनीय: प्रयत्नत:।
तत्रापि नापराध्यामीत्येवं मनसि मे स्थितम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे पिता परम गुरु हैं और पूजनीय हैं। और मेरे मन में यह भी विचार है कि मैं उनके साथ कोई अन्याय नहीं करूँगा॥17॥ |
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| There is no doubt that my father is the supreme Guru and is worthy of worship. And I also have this thought in my mind that I will not do any wrong to him.॥ 17॥ |
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