श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 18: प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.18.17 
पिता गुरुर्न सन्देह: पूजनीय: प्रयत्नत:।
तत्रापि नापराध्यामीत्येवं मनसि मे स्थितम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे पिता परम गुरु हैं और पूजनीय हैं। और मेरे मन में यह भी विचार है कि मैं उनके साथ कोई अन्याय नहीं करूँगा॥17॥
 
There is no doubt that my father is the supreme Guru and is worthy of worship. And I also have this thought in my mind that I will not do any wrong to him.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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