श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  1.17.91 
तस्मिन्प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं
धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते।
समाश्रिताद‍्ब्रह्मतरोरनन्ता-
न्नि:संशयं प्राप्स्यथ वै महत्फलम्॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
जब वे अच्युत प्रसन्न हो जाएँ, तब संसार में क्या दुर्लभ है? धर्म, अर्थ और काम की कभी इच्छा न करो; ये अत्यंत तुच्छ हैं। उस ब्रह्मरूपी महान वृक्ष का आश्रय लेकर तुम निःसंदेह महान फल (मोक्ष रूपी) को प्राप्त करोगे॥91॥
 
When that Achyuta is pleased, then what is rare in the world? You should never desire Dharma, Artha and Kama; they are extremely trivial. By taking shelter of that great tree in the form of Brahma, you will undoubtedly attain the great fruit [in the form of Moksha]. ॥91॥
 
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तदशोऽध्याय:॥ १७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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