श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  1.17.90 
असारसंसारविवर्तनेषु
मा यात तोषं प्रसभं ब्रवीमि।
सर्वत्र दैत्यास्समतामुपेत
समत्वमाराधनमच्युतस्य॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यों! मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इस नाशवान संसार की वस्तुओं से कभी संतुष्ट न हों। सर्वत्र समभाव रखें, क्योंकि समता ही श्री अच्युत की वास्तविक पूजा है। ॥90॥
 
O demons! I insist that you should never be satisfied with the things of this ephemeral world. You should have an equal view everywhere, because equality is the [real] worship of Shri Achyuta. ॥90॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)