असारसंसारविवर्तनेषु
मा यात तोषं प्रसभं ब्रवीमि।
सर्वत्र दैत्यास्समतामुपेत
समत्वमाराधनमच्युतस्य॥ ९०॥
अनुवाद
हे दैत्यों! मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इस नाशवान संसार की वस्तुओं से कभी संतुष्ट न हों। सर्वत्र समभाव रखें, क्योंकि समता ही श्री अच्युत की वास्तविक पूजा है। ॥90॥
O demons! I insist that you should never be satisfied with the things of this ephemeral world. You should have an equal view everywhere, because equality is the [real] worship of Shri Achyuta. ॥90॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)