श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.17.85 
समुत्सृज्यासुरं भावं तस्माद्यूयं तथा वयम्।
तथा यत्नं करिष्यामो यथा प्राप्स्याम निर्वृतिम्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
अतः आसुरी वृत्ति को त्यागकर हमें और आपको ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे हम शांति प्राप्त कर सकें। 85.
 
Therefore leaving behind the demoniac attitude we and you should make such efforts that we can achieve peace. 85.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)