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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित
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श्लोक 84
श्लोक
1.17.84
विस्तार: सर्वभूतस्य विष्णो: सर्वमिदं जगत्।
द्रष्टव्यमात्मवत्तस्मादभेदेन विचक्षणै:॥ ८४॥
अनुवाद
यह सम्पूर्ण जगत् सर्वव्यापी भगवान् विष्णु का ही विस्तार है, अतः विवेकशील मनुष्यों को इसे आत्मा के समान अविभेद देखना चाहिए ॥84॥
This entire universe is an extension of the omnipresent Lord Vishnu, hence discerning people should see it as undifferentiated as the soul. 84॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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