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vishnu 1.17.66: जीव जितना ही अपने हृदय को प्रिय सम्बन्ध जोड़ता है, उतने ही अधिक दुःख रूपी काँटे उसके हृदय में गड़ते जाते हैं ॥66॥   |   vishnu अध्याय 1.17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.17.66 
यावत: कुरुते जन्तु: सम्बन्धान्मनस: प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कव:॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
जीव जितना ही अपने हृदय को प्रिय सम्बन्ध जोड़ता है, उतने ही अधिक दुःख रूपी काँटे उसके हृदय में गड़ते जाते हैं ॥66॥
 
The more a living being develops relationships that are dear to his heart, the more the thorns of sorrow become fixed in his heart. ॥ 66॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)