श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.17.65 
करोति हे दैत्यसुता यावन्मात्रं परिग्रहम्।
तावन्मात्रं स एवास्य दु:खं चेतसि यच्छति॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हे राक्षसों! जितनी अधिक वस्तुएँ एकत्रित की जाती हैं, उतनी ही अधिक वे मनुष्य के मन में दुःख बढ़ाती हैं ॥65॥
 
O demons! The more things are collected, the more they increase sorrow in a person's mind. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)