श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.17.63 
मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ।
देहे चेत्प्रीतिमान् मूढो भविता नरकेऽप्यसौ॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
यदि मूर्ख मनुष्य मांस, रक्त, मवाद, मल, मूत्र, स्नायु, मज्जा और हड्डियों के संग्रहरूप इस शरीर में प्रेम कर ले, तो उसे नरक भी प्रिय हो सकता है ॥ 63॥
 
If a foolish person can develop love for this body which is a collection of flesh, blood, pus, feces, urine, nerves, marrow and bones, then he may even like hell. ॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)