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vishnu 1.17.47: प्रह्लाद बोले, "हे प्रिय! यद्यपि यह अग्नि वायु द्वारा संचालित है, फिर भी यह मुझे जला नहीं पाती। मुझे तो सभी दिशाएँ ऐसी शीतल प्रतीत होती हैं, मानो मेरे चारों ओर कमल फैले हुए हों।"   |   vishnu अध्याय 1.17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.17.47 
प्रह्लाद उवाच
तातैष वह्नि: पवनेरितोऽपि
न मां दहत्यत्र समन्ततोऽहम्।
पश्यामि पद्मास्तरणास्तृतानि
शीतानि सर्वाणि दिशाम्मुखानि॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद बोले, "हे प्रिय! यद्यपि यह अग्नि वायु द्वारा संचालित है, फिर भी यह मुझे जला नहीं पाती। मुझे तो सभी दिशाएँ ऐसी शीतल प्रतीत होती हैं, मानो मेरे चारों ओर कमल फैले हुए हों।"
 
Prahlada said, "O dear! Even though this fire is driven by the wind, it does not burn me. To me all directions appear so cool as if lotuses are spread all around me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)