श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 88-89
 
 
श्लोक  1.15.88-89 
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ता: प्रजा:।
तत: सञ्चिन्त्य स पुन: सृष्टिहेतो: प्रजापति:॥ ८८॥
मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधा: प्रजा:।
असिक्नीमावहत्कन्यां वीरणस्य प्रजापते:।
सुतां सुतपसा युक्तां महतीं लोकधारिणीम्॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सृष्टि करते हुए जब उनकी प्रजा और अधिक नहीं बढ़ी, तब प्रजापति ने सृष्टि बढ़ाने की इच्छा से वीरण प्रजापति की अत्यंत तपस्वी एवं विश्व-पालक पुत्री असिक्नी से मैथुन द्वारा नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से विवाह किया। 88-89।
 
When his population did not increase further while creating in this manner, then Prajapati, with the desire to increase the creation, married Asikni, the extremely ascetic and world-bearer daughter of Veeran Prajapati, with the desire to produce various kinds of population through sexual intercourse. 88-89.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)