श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.15.58 
ब्रह्माक्षरमजं नित्यं यथाऽसौ पुरुषोत्तम:।
तथा रागादयो दोषा: प्रयान्तु प्रशमं मम॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि वे अविनाशी, अपरिवर्तनशील और सनातन ब्रह्म ही परब्रह्म भगवान विष्णु हैं, इसलिए [उनके नित्य भक्त होने के कारण] मेरे आसक्ति आदि दोष शान्त हो जाएँ॥ 58॥
 
Because that imperishable, unchangeable and eternal Brahma is the Supreme Lord Vishnu, therefore [being His eternally devoted devotee] may my defects like attachment etc. be pacified.'॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)