श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  1.15.52-53 
श्रीपराशर उवाच
स चापि भगवान‍् कण्डु: क्षीणे तपसि सत्तम:।
पुरुषोत्तमाख्यं मैत्रेय विष्णोरायतनं ययौ॥ ५२॥
तत्रैकाग्रमतिर्भूत्वा चकाराराधनं हरे:।
ब्रह्मपारमयं कुर्वञ्जपमेकाग्रमानस:।
ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी स्थित्वासौ भूपनन्दना:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! [तब यह सोचकर कि कहीं ऋषिगण योगभ्रष्ट की पुत्री होने के कारण मारिषा को अस्वीकार्य न मान लें, सोमदेव बोले -] श्रेष्ठ मुनि भगवान कंडु भी तप के क्षीण हो जाने के कारण पुरुषोत्तम क्षेत्र नामक भगवान विष्णु के धाम में चले गए और हे राजपुत्रों ! वहाँ वे महायोगी पुरुष एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मपर मन्त्र का जप करते हुए, भुजाएँ ऊपर उठाकर भगवान विष्णु की आराधना करने लगे ॥52-53॥
 
Shri Parasharji said – O Maitreya! [Then thinking that the sages might not consider Marisha unacceptable because she was the daughter of a Yogabhrashta, Somdev said –] Lord Kandu, the best saint, also went to the abode of Lord Vishnu called Purushottam Kshetra due to his penance becoming weak and O sons of the king! There, those great yogis started worshiping Lord Vishnu with their arms raised, chanting the Brahmapar mantra with a single-minded focus. 52-53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)