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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन
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श्लोक 42
श्लोक
1.15.42
अथवा तव को दोष: किं वा कुप्याम्यहं तव।
ममैव दोषो नितरां येनाहमजितेन्द्रिय:॥ ४२॥
अनुवाद
अथवा इसमें तुम्हारा क्या दोष है, जो मैं तुम पर क्रोध करूँ? दोष तो मेरा ही है, क्योंकि मैं अपनी इन्द्रियों पर अत्यन्त अजित हूँ ॥42॥
Or what is your fault in this, that I should get angry with you? The fault is all mine, because I am very unconquerable of my senses. ॥ 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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