श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.15.40 
गच्छ पापे यथाकामं यत्कार्यं तत्कृतं त्वया।
देवराजस्य मत्क्षोभं कुर्वन्त्या भावचेष्टितै:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
"अरे पापी! अब जहाँ चाहो जाओ। मुझे अपनी भक्ति से मोहित करके तुमने इन्द्र का कार्य पूर्ण कर दिया है।"
 
"Oh sinner! Now go wherever you wish. By enchanting me with your devotion you have completed Indra's task."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)