श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.15.18 
पुनर्गते वर्षशते साधिके सा शुभानना।
यामीत्याह दिवं ब्रह्मन‍्प्रणयस्मितशोभनम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर, सौ वर्ष से कुछ अधिक समय व्यतीत होने पर उस सुन्दर मुख ने पुनः प्रेमपूर्ण मुस्कान के साथ सुन्दर शब्दों में कहा - "ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्ग को जाता हूँ ॥18॥
 
After that, after a little more than a hundred years had passed, that beautiful face again said in beautiful words with a loving smile – “Brahman! Now I go to heaven. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)