श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  1.15.147 
विषानलोज्ज्वलमुखा यस्य दैत्यप्रचोदिता:।
नान्ताय सर्पपतयो बभूवुरुरुतेजस:॥ १४७॥
 
 
अनुवाद
राक्षसराज द्वारा प्रेरित विषैली अग्नि से प्रज्वलित मुखवाले सर्प भी जिन्न के महान तेज को रोक न सके ॥147॥
 
Even the snakes with their mouths ablaze with poisonous fire inspired by the demon king could not put an end to Jinn's great brilliance. 147॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)