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श्लोक 1.13.95  |
दुस्स्वप्नोपशमं नॄणां शृण्वतामेतदुत्तमम्।
पृथोर्जन्म प्रभावश्च करोति सततं नृणाम्॥ ९५॥ |
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| अनुवाद |
| पृथु के जन्म और उसके प्रभाव की यह उत्तम कथा सुननेवालों के दुःस्वप्नों का सदैव शमन करती है ॥95॥ |
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| This excellent story of Prithu's birth and its influence always quells the nightmares of those who hear it. ॥95॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥ |
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